अठारह साल जंगल में गुज़ारने के बाद हज़रत ख़्वाजा दाना साहब शहर बल्ख़ में तशरीफ़ लाए यहाँ आप ने बल्ख़ के मशहूर सूफी हज़रत ख़्वाजा सैयद मुहम्मद पारसा के पोते हज़रत ख़्वाजा अब्दुल हादी के मकान पर क़याम फरमाया.हज़रत ख़्वाजा अब्दुल हादी की बीवी शाहबेगम पूरे ख़ुलूस व मुहब्बत के साथ हज़रत ख़्वाजा दाना साहब की ख़िदमत को अपने लिए बाइसे अज़मत समझते हुए अंजाम देती थीं,खाना अपने हाथ से खिलातीं ओर हर वक़्त हज़रत ख़्वाजा दाना पर नज़रे खुसूसी रखती थीं.जब तक आप उनके यहाँ क़याम पज़ीर रहे किसी भी क़िस्म की कोई तकलीफ आपको नहीं हुई.
सीरते शहंशाहे सुरत हज़रत ख़्वाजा दाना जमालुद्दीन रहमतुल्लाह अलैह
Tuesday, February 1, 2011
ख़तरनाक जानवरों के साथ जंगल में अल्लाह तआला की इबादत
हज़रत ख़्वाजा सैयद मुहम्मद साहब के जाने के बाद हज़रत ख़्वाजा दाना साहब जंगल ही में तनेतनहा अल्लाह रब्बुल इज्ज़त की इबादत में मशगूल हो गए. जंगल के ख़तरनाक जानवरों से आप को बहुत प्यार था.रात को जब आप अल्लाह अल्लाह करते तो जंगल के शेर,बबर,चीता,रीछ,हिरन,हाथी वगैरह आप के चारों तरफ बैठ जाते ओर अल्लाह अल्लाह की नूरानी सदाओं को बहुत मेह्विय्यत ओर जज़्बे से सुनते, बाज़ औक़ात तो यूँ महसूस होता कि गोया वो जानवर भी उनके ज़िक्र के साथ शामिल हो गए हैं.इस तरह उन्हें जंगल में रहते हुए कुछ अरसा गुज़र गया,लेकिन अल्लाह तआला ने आपकी ज़ाते गिरामी से अपने बन्दों के लिए फैज़ हासिल करना लिखा था. इस लिए अब जंगल की ज़िन्दगी से आप दुनियावी ज़िन्दगी की तरफ राग़िब होते हैं.
तालीम व तरबियत के लिए दूसरी बशारत
हज़रत ख़्वाजा हसन अता रहमतुल्लाहि तआला अलैह के विसाल फरमाने के बाद हज़रत ख़्वाजा दाना साहब के वालिदे गिरामी हज़रत हज़रत ख़्वाजा सैयद बादशाह पर्दहपोश ने अपने दुसरे हर-दिल-अज़ीज़ शागिर्द हज़रत ख़्वाजा सैयद मुहम्मद को ख्वाब में ये हुक्म दिया के वो मेरे साहब ज़ादे ख़्वाजा दाना को मज़ीद तालीम व तरबियत दें कि अभी उन में कुछ कमी है, चुनान्चे पीर व मुर्शिद का हुक्म मिलते ही हज़रत ख़्वाजा सैयद मुहम्मद हज़रत ख़्वाजा दाना की तलाश में निकल पड़े. तलाश करते करते ख़ुरासान के जंगल में पहोंचे तो क्या देखते हैं कि हज़रत ख़्वाजा दाना हिरनों के टोले में जलवा अफरोज़ हैं. हरनों ने हज़रत ख़्वाजा सैयद मुहम्मद को देखा तो भागने लगे. हज़रत ख़्वाजा दाना भी चल पड़े, ये सिलसिला तीन दिन तक चलता रहा ओर हज़रत ख़्वाजा सैयद मुहम्मद की हज़रत ख़्वाजा दाना साहब से रू-ब-रू मुलाक़ात न हो सकी. आख़िर एक दिन हज़रत ख़्वाजा सैयद मुहम्मद ने इन्तेहाई आजिज़ी ओर इन्केसारी ओर मिन्नत व समाजत के बाद उनका रास्ता रोक कर फरमाया! साहब ज़ादे! में आपके वालिदे गिरामी का मुरीद हूँ, उनहोंने ख्वाब में तशरीफ़ लाकर मुझे आप की तालीम व तरबियत के लिए हुक्म दिया है ओर आप हैं कि मुझ से दूर-दूर भाग रहे हैं. चुनान्चे इतना सुनना था कि हज़रत ख़्वाजा दाना फ़ौरन रुक गए ओर उसी जगह झोंपड़ी में दोनों रहने लगे. हज़रत ख़्वाजा सैयद मुहम्मद ने बड़ी मेहनत व जांफिशानी के साथ हज़रत को मुकम्मल छे(६) साल तक शरीअत, तरीक़त, हकीकत, ओर मारिफत, की मुकम्मल तालीम से आरास्ता फरमाने के बाद हज़रत ख़्वाजा दाना की इजाज़त से अपने वतन लौट आये.
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